दीदी जी का भौतिक जन्म भारत के उत्तर प्रदेश प्रान्त के रामपुर नगर में हुआ।
दीदी जी ने श्री श्रीमन् नारायण गुप्ता (पिताजी) एवं श्रीमती कुसुम गुप्ता (माताजी) के घर 7 अप्रैल, सन् 1974 को इनकी दूसरी संतान के रूप में जन्म लिया। चाव से इनका नाम रेनू गुप्ता रखा गया। माता-पिता तो श्री महाराज जी के अनन्य भक्त बने ही, इनके संसर्ग से दीदी जी की अन्य दो बहनें व एक भाई भी अपने विगत जन्मों के सुकृत के प्रभाव से श्री महाराज जी के ऐसे भक्त निकले कि इन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन श्री महाराज जी की इच्छा और उनकी आज्ञा पर समर्पित कर दिया।
सन् 1982 में श्री महाराज जी पब्लिक लेक्चर के लिये रामपुर पधारे। उस अवसर पर दीदी ने अपनी मम्मी के साथ प्रथम बार श्री महाराज जी के अत्यन्त निकट से दर्शन प्राप्त किये। उस समय दीदी की आयु मात्र 7 वर्ष थी। उस समय की भोली-भाली रेनू को भला क्या पता था कि श्री महाराज जी ने उनकी भावी को रचने हेतु उन पर अपनी कैसी कृपा दृष्टि डाली है और भविष्य में उनका जीवन अध्यात्म के कैसे-कैसे उच्च शिखरों को छूने वाला है।
असली श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष का दर्शन व सत्संग अधिकारी जीवों को शक्तिशाली चुम्बक की भान्ति भगवान की ओर खींचता ही है, पुनः श्री महाराज जी तो साक्षात् रसिक शिरोमणि ठहरे, अतएव उनके सत्संग और सानिध्य का ऐसा प्रभाव होता गया कि दीदी जी का मन संसार की ओर किंचित् आकृष्ट हो पाता, इसके लिये अवकाश ही न मिल पाया। स्कूल की पढ़ाई जारी तो रही परन्तु किसी त्यौहार के अवसर पर दो-चार छुट्टियाँ मिलें अथवा ग्रीष्मकालीन लम्बे अवकाश का सुअवसर हो, ये अपनी मम्मी के साथ तुरन्त मनगढ़ कूच कर जातीं। दीदी जी ने अपने विद्यार्थी जीवन में कभी एक छुट्टी भी अपने किसी रिश्तेदार के घर व्यर्थ नहीं गँवाई। रसिक शिरोमणि अपने बहुआयामी आकर्षण से इनको अपनी ओर खींच रहे थे और एक दिन एकांत में उन्होंने अपनी भविष्य की योजना का संकेत करते हुये दीदी से कह दिया, "तुम्हें संसार की नौकरी नहीं करनी। तुम्हें तो मेरी सेवा करनी है।" इतना आश्वासन पाकर दीदी विभोर हो गईं, फिर भी मन में यह ऊहापोह बनी रही कि जाने क्या सेवा करनी है, कैसे करनी है, कब से करनी है।
स्कूल की छुट्टियाँ ख़त्म होने पर मनगढ़ से पुनः लौटना पड़ता, परन्तु तब भी निरन्तर पत्र-व्यवहार के माध्यम से श्री महाराज जी का सानिध्य, स्नेह एवं मार्गदर्शन सदा मिलता रहता। श्री महाराज जी की प्रेरणा और उनकी आज्ञा से ही मानो अब जीवन स्कूल से बँधा हुआ था। जब दीदी दसवीं में थीं तब उनके एक पत्र के उत्तर में श्री महाराज जी ने लिख भेजा, "खूब पढ़ो, योग्य बनो। फिर हम तुम्हें वेद-शास्त्र पढ़ायेंगे।"
दीदी जी का मन निरन्तर श्री महाराज जी के चिंतन में डूबा रहने से उनकी संसार से आत्यंतिक विरक्ति बढ़ती चली गयी। गुरु सेवा की लालसा अत्यन्त तीव्र होने से एक बार दीदी श्री महाराज जी के कक्ष में जा पहुँची और उनसे आग्रहपूर्वक कहा, "महाराज जी! आप मेरा नाम बदल दीजिये।" श्री महाराज ने इन्हें देखा और मुस्कुराते हुए कहा, "इकट्ठा ही नाम बदलूँगा।" पुनः दीदी जी की प्रबल सेवा भावना को भाँपकर श्री महाराज जी ने कह दिया, "अरे! तू तो ब्रज रेनू है, जा।"
श्री महाराज जी की आज्ञा मानकर दीदी ने सन् 1995 में हिन्दू कॉलेज, मुरादाबाद से संस्कृत में एम० ए० की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और अपने कॉलेज में टॉप किया। पढ़ाई से निवृत्त होने के पश्चात् अपने भविष्य की योजना का सम्पूर्ण भार मन ही मन श्री महाराज जी को सौंपकर दीदी व्यग्रतापूर्वक अपनी भावी के लिये उनके पत्र की नित्य प्रतीक्षा किया करतीं। जुलाई, 1995 की एक दोपहर थी, डाकिया चिट्ठी के रूप में गुरु का आदेश थमा गया। चिट्ठी में लिखा था, "मेरी सेवा के लिये तुरन्त चली आओ।" दीदी गद्गद् थी, मानो गोलोक का वीज़ा मिल गया हो। श्री महाराज जी का स्पष्ट संदेश पढ़कर 7 जुलाई, सन् 1995 को ये श्री महाराज जी की सेवा करने का लक्ष्य मन में सँजोये सदा-सदा के लिये संसार त्यागकर तुरन्त मसूरी रवाना हो गईं। पुनः सन् 1996 के ग्रीष्म में मसूरी में दीदी जी ने महाराज श्री के विशेष कृपा पात्रों के मध्य रहकर निष्काम भक्ति सम्बन्धी अनेक सूक्ष्म बातों का व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया तथा अपनी सेवा और साधना को आगे बढ़ाया। फिर श्री महाराज जी ने अपनी विशेष अनुकम्पा से इन्हें अत्यल्प समय में समस्त वेद-शास्त्रों का सम्यक् ज्ञान कराया।
सन् 1998 में 19 अक्तूबर के दिन भक्तिधाम मनगढ़ में जब जगदम्बा स्वरूपा प्यारी प्यारी अम्मा के जन्मदिवस की धूम मची थी, उस दीपावली के शुभ मुहूर्त्त में श्री महाराज जी ने आपको दिव्य पीत वस्त्र प्रदान कर संन्यास ग्रहण कराया एवं आपको ‘अखिलेश्वरी देवी’ की संज्ञा प्रदान की। तभी से आप अपने अथक प्रयासों से श्री महाराज जी के सिद्धांतों को अपने विलक्षण प्रवचनों के द्वारा प्रचारित कर भगवद् तत्त्व के पिपासु जीवों को कृतार्थ कर रहीं हैं।
सन् 1999 से 2013 तक श्री महाराज जी के विशेष अनुग्रह से आपने वार्षिक साधना शिविर मनगढ़ में प्रत्येक वर्ष क्लास टीचर का विशेष कार्यभार सँभाला।
दीदी जी जब भक्तिरस परिप्लुत भजनों को अपने सुरीले कंठ की दिव्य मधुरिमा से सिक्त कर प्रस्तुत करती हैं, तो प्रेमरस पिपासु भक्त उस अलौकिक रस-प्रवाह में बहने लगते हैं। आप निरंतर अनेकानेक जिज्ञासु, पिपासु जीवों को निष्काम भक्ति के सर्वोच्च लक्ष्य तक ले जाने के लिए उनकी भक्ति विषयक पिपासा को समुचित दिशा देने की अथक चेष्टा कर रहीं हैं।
आपने अपना सम्पूर्ण जीवन अपने दिव्य ज्ञान से विश्व को स्तब्ध कर देने वाले श्री महाराज जी की सेवा में उनके अनुपम सिद्धांत के प्रचार हित समर्पित कर दिया है। सन्यासी वेश में आप त्याग एवं वैराग्य की जीवन्त मूर्ति बन संसारासक्त जीवों को भगवदोन्मुख होने की सहज प्रेरणा देतीं हैं। सत्संगी जन देवी जी को स्नेहवश दीदी जी कहकर पुकारते हैं। जब आप साधना विषयक अनेक जटिल जिज्ञासाओं का चुटकियों में सहज समाधान कर साधकों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करतीं हैं, तब यह निर्णय करना कठिन हो जाता है कि आपकी अनुभवपूर्ण विद्वत्ता बड़ी है अथवा आपका सहज सुलभ अपनत्व बड़ा है। आपका सत्संग पाकर जब साधक आप में जीव कल्याण की नित्य ललक तथा निष्काम गुरु सेवा की अतृप्त प्यास देखता है तो वह स्वतः आपका अनुचर बन जाता है।
प्रारंभ में दीदी जी ने उत्तर प्रदेश में प्रचार किया, पश्चात् आप अब लगभग डेढ़ दशक से निरंतर पंजाब, हरियाणा तथा हिमाचल में पंचम मूल जगद्गुरु के ‘प्रेम-रस-सिद्धांत’ का प्रचार कर रहीं हैं। महाराष्ट्र और पूर्वी देश म्यांमार भी दीदी जी के सेवा क्षेत्र हैं जहाँ आपने धारावाहिक प्रवचनों के साथ-साथ भरपूर संकीर्तन रस लुटाया है। आप जगद्गुरु कृपालु परिषत् की शाखा के रूप में स्थापित 'श्यामा श्याम समिति, जीरकपुर (चंडीगढ़)' की अध्यक्षा हैं। वर्तमान में यही आश्रम आपकी कृपापूर्ण सेवाओं का प्रमुख केंद्र है।
राधे राधे